
भोपाल। प्रदेश की आधी से अधिक आबादी यानी 15 से 49 वर्ष की 54.7 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) और गैर-संक्रामक बीमारियों (एनसीडी) के गंभीर संकट से जूझ रही हैं।
नीति आयोग के स्वास्थ्य सूचकांकों में भी मातृ स्वास्थ्य और पोषण के पैमाने पर मध्य प्रदेश देश के बड़े राज्यों में लगातार निचले पायदान पर बना हुआ है। आंकड़े राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) की रिपोर्ट के अनुसार हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति और भी विकट है। यहां 56 प्रतिशत से अधिक महिलाओं के शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से काफी कम है। सबसे डराने वाली बात यह है कि सूबे की 52.9 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं भी एनीमिया से पीड़ित हैं। डॉक्टरों के अनुसार, यह स्थिति न केवल मां की सेहत के लिए खतरनाक है, बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के मानसिक और शारीरिक विकास को भी प्रभावित कर रही है।
दरअसल, मध्य प्रदेश में महिलाओं को बेहतर इलाज देने के लिए वर्ष 2021 से 50 हजार हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर बनाने की शुरुआत हुई थी, लेकिन लक्ष्य के मुकाबले अभी तक लगभग 10 हजार सेंटर ही बन पाए हैं। इन केंद्रों में महिलाओं को 12 तरह की स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने का प्रावधान है। यदि इनका सही ढंग से क्रियान्वयन हो, तो एनीमिया में काफी कमी आ सकती है।
बदलती जीवनशैली और शारीरिक सक्रियता की कमी के कारण शहरी महिलाओं में मोटापा और हार्मोनल असंतुलन तेजी से बढ़ा है। आंकड़ों के अनुसार प्रदेश की 20.8 प्रतिशत शहरी महिलाएं ओवरवेट (मोटापे) की श्रेणी में आ चुकी हैं।
15 वर्ष से अधिक उम्र की 11.4 प्रतिशत महिलाओं में हाई ब्लड शुगर (डायबिटीज) की पुष्टि हुई है। 12.1 प्रतिशत महिलाएं हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) की गिरफ्त में हैं। यही मोटापा और अनियंत्रित ब्लड शुगर आगे चलकर महिलाओं में थायराइड, पीसीओडी और बांझपन जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म दे रहा है।
मध्य प्रदेश में इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं का एनिमिक होना एक कलंक की बात है। इसके लिए महिला बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग के साथ-साथ परिवार की भी बड़ी जिम्मेदारी बनती है। समाज में जिस तरह पुरुषों के स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाता है, उसी तरह महिलाओं की सेहत को लेकर भी प्राथमिकता तय करनी होगी। - डॉ. पंकज शुक्ला, पूर्व संयुक्त संचालक, एनएचएम (मप्र)।