इजराइल में आज सुबह 7 बजे (भारतीय समय के मुताबिक 9:30 बजे) से संसदीय चुनाव के लिए वोटिंग शुरू होगी। इस बार नेतन्याहू के बजाय पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार हैं।

छह में से चार ओपिनियन पोल में आइजनकोट के गठबंधन को ज्यादा सीटें दी गई हैं। वहीं नेतन्याहू के गठबंधन को एक पोल में बढ़त और एक पोल में बहुमत मिला है।

इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है। इजराइल के 76 साल के इतिहास में आज तक किसी भी राजनीतिक पार्टी ने अकेले बहुमत हासिल नहीं किया है।


जिस पार्टी को ज्यादा वोट, उसे ज्यादा सीटें

इजराइल में लोग किसी नेता को नहीं, बल्कि उसकी पार्टी को वोट देते हैं। चुनाव से पहले हर पार्टी अपने उम्मीदवारों की एक सूची बनाती है। पूरे देश में पार्टी को मिले वोटों के आधार पर तय होता है कि उसे संसद में कितनी सीटें मिलेंगी।

लेकिन संसद में सीट पाने के लिए एक शर्त है। किसी पार्टी को कुल वैध वोटों में से कम से कम 3.25% वोट हासिल करने होते हैं। इससे कम वोट मिलने पर पार्टी को संसद में कोई सीट नहीं मिलती।

पार्टी के कौन से उम्मीदवार सांसद बनेंगे, इसका फैसला उम्मीदवारों की लिस्ट से होता है। हर पार्टी चुनाव से पहले अपने उम्मीदवारों की एक लिस्ट जारी करती है। अगर किसी पार्टी को 20 सीटें मिलती हैं, तो लिस्ट में पहले 20 नंबर पर मौजूद उम्मीदवार सांसद बन जाएंगे।

चुनाव में 4 बड़े मुद्दे…

1. 7 अक्टूबर के हमास हमले की जांच: 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजराइल पर हमला किया था। इस हमले को रोकने में इजराइली सेना और खुफिया एजेंसियां नाकाम रही थीं।

तीन साल बाद भी सरकार ने इस बात की जांच के लिए आयोग नहीं बनाया है कि इतनी बड़ी चूक कैसे हुई। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस हमले को रोकने में नाकाम रही और उसे इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

2. सेना में भर्ती को लेकर विवाद: इजराइल में ज्यादातर यहूदियों के लिए सेना में सेवा देना जरूरी है। 1948 में इजराइल बनने के बाद, हरेदी समुदाय के 400 लोगों को यहूदी संस्थानों में पढ़ने के लिए सेना में भर्ती होने से छूट मिली थी।

इसका मकसद धार्मिक विद्वानों की पढ़ाई और परंपरा को बचाए रखना था। लेकिन धीरे-धीरे छूट का दायरा बढ़ता गया। इसी छूट को लेकर आज इजराइल में विवाद है।

दूसरे समुदाय के लोगों का कहना है कि जब देश युद्ध में है, तब सभी को सेना में सेवा देनी चाहिए। नेतन्याहू को हरेदी समुदाय के लोगों का वोट मिलता है। ऐसे में वे इस छूट को बरकार रखना चाहते हैं।

वहीं गादी आइजनकोट का रुख नेतन्याहू से अलग है। वे चाहते हैं कि हरेदी समुदाय के लोगों को भी सेना या नागरिक सेवा में शामिल होना चाहिए।


3. सुप्रीम कोर्ट की ताकत कम करने की कोशिश: गाजा में युद्ध शुरू होने से पहले नेतन्याहू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की ताकत कम करने की कोशिश की थी। यह मुद्दा आज भी नेतन्याहू सरकार और उसके विरोधियों के बीच टकराव की बड़ी वजह है।

4. देश की सुरक्षा और युद्ध कब खत्म होगा: नेतन्याहू ने हमास के खिलाफ पूरी जीत का वादा किया था, लेकिन हमास और लेबनान का हिजबुल्लाह अब भी एक्टिव हैं।

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नेतन्याहू: सेना की कमांडो यूनिट में काम किया

नेतन्याहू 1967 में इजराइली सेना में भर्ती हुए थे। उन्होंने सेना की एलीट स्पेशल फोर्स यूनिट ‘सायरेत मतकल’ में सेवा दी। यह यूनिट खुफिया अभियानों और बंधकों को छुड़ाने जैसे विशेष सैन्य ऑपरेशन्स के लिए जानी जाती है।

नेतन्याहू 1972 में सबेना एयरलाइंस के विमान को हाईजैक किए जाने के बाद बंधकों को छुड़ाने के अभियान में भी शामिल थे।

नेतन्याहू के बड़े भाई योनातन 1976 में युगांडा के एंटेबे में बंधकों को छुड़ाने के अभियान के दौरान मारे गए थे। वे इस अभियान का नेतृत्व कर रहे थे।


आइजनकोट: आम सैनिक से सेना प्रमुख बने

आइजनकोट ने 1978 में गोलानी ब्रिगेड में एक आम सैनिक के तौर पर करियर शुरू किया। करीब 38 साल की सेवा के बाद वे 2015 में इजराइल के सेना प्रमुख बने। इस पद पर वे 2019 तक रहे।

सेना प्रमुख के तौर पर उन्होंने सेना की रणनीति और सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों की जिम्मेदारी संभाली। उनके नाम से जुड़ी सैन्य रणनीति को ‘आइजनकोट डॉक्ट्रिन’ कहा जाता है।

गाजा युद्ध के दौरान दिसंबर 2023 में आइजनकोट के बेटे गाल की मौत हो गई। इसके अगले दिन उनके भतीजे माओर कोहेन आइजनकोट भी दक्षिणी गाजा में लड़ाई के दौरान मारे गए।


इजराइल में 27 अक्टूबर को वोट पड़ेंगे। सर्वे में मौजूदा पीएम बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी विपक्षी आइजनकोट से पिछड़ रही है। इसके बावजूद नेतन्याहू के 7वीं बार प्रधानमंत्री बनने का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होगा।