सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की अपील फेल, दुनिया के सामने पीड़ित बनने का दांव क्यों हुआ बेअसर, जानें

Updated on 08-07-2026 02:17 PM
इस्लामाबाद: भारत के सिंधु संधि निलंबित करने के मुद्दे पर पाकिस्तान ने लगातार आक्रामक रुख दिखाया है। पाकिस्तानी नेताओं और सैन्य नेतृत्व ने भारत पर 'पानी को हथियार बनाने' का आरोप लगाया है और पानी रुकने पर युद्ध की गीदड़भभकी दी है। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत को घेरने की कोशिश में है। पाकिस्तान के पहले से बने 'पब्लिक रिलेशंस सिस्टम' ने सिंधु जल संधि (IWT) पर भारत के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाया है। हालांकि एक्सपर्ट का मानना है कि उसे भारत को दुनिया के सामने बदनाम करने में बहुत कामयाबी नहीं मिलेगी।
एचटी के मुताबिक, पाकिस्तान ने जलवायु संकट जैसे मुद्दों से जोड़ते हुए सिंधु संधि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश की है। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण जैसे तर्क अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति पाने के लिए हैं, खासकर ऐसे समय में जब पानी की सुरक्षा एक वैश्विक चिंता का विषय है। पाकिस्तान इसे दक्षिण एशिया में 'पर्यावरणीय तबाही की वजह' तरह पेश कर रहा है।

'पाकिस्तान पीड़ित बनने में माहिर'

पाकिस्तान खुद को पीड़ित दिखाने और नदी के निचले इलाके की कमजोरी के तौर पर पेश करने में माहिर रहा है। उसकी इस रणनीति का ऐतिहासिक उदाहरण 1952 में मौजूद है, जब पाकिस्तान के विदेश मंत्री जफरुल्लाह खान ने पानी बंटवारे के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में उठाया था। उन्होंने भारत पर बार-बार सिंधु बेसिन का पानी बंद करने का आरोप लगाया था।

जफरुल्लाह खान ने UNSC में कहा था कि भारत के पानी बंद करने से पाकिस्तान की खेती सूख जाती है और किसानों को नुकसान होता है। उनके तर्क से UNSC के सदस्य प्रभावित हुए थे। 1957 में जुल्फिकार भुट्टो ने यूएन में प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के तौर पर नदी के बहाव में नीचे की ओर बसे देशों को पानी के इस्तेमाल के अधिकारों से वंचित किया जाने पर चिंता जताई थी।

पाकिस्तान का दुनिया के सामने झूठ

पाकिस्तान पानी के मुद्दे पर जो बातें 50 के दशक में कर रहा था, वही अब कर रहा है। पाकिस्तान IWT को गलत तरीके से पेश कर रहा है। वह संधि के तहत मिले अधिकारों को संप्रभु अधिकारों के साथ मिलाकर दुनिया को गुमराह कर रहा है। लेकिन वह यही तो चाहता है। पाकिस्तान इसे छुपाता है कि इन नदियों का पानी उसे 1960 की संधि के कारण मिलता है, ना कि उसका अपना मालिकाना हक है।

IWT को ध्यान से पढ़ने पर साफ पता चलता है कि यह संधि पानी के इस्तेमाल के बंटवारे के बारे में है। संधि ने भारत के इलाके में बहने वाली नदियों पर भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता बनाए रखी है। वहीं इसने उनके पानी के इस्तेमाल से जुड़ी संधि आधारित जिम्मेदारियां तय की हैं। ऐसे में मूल रूप से यह संधि दो संप्रभु देशों के बीच पानी के इस्तेमाल को खास प्रावधानों और प्रतिबंधों के साथ नियंत्रित करती है।

पाकिस्तान के तर्क नहीं चलेंगे!

सिंधु संधि एक बुनियादी धारणा पर टिकी रही कि पानी के बंटवारे पर तकनीकी सहयोग राजनीतिक मतभेदों के बावजूद बना रहेगा, बशर्ते दोनों पक्ष शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के मानक का पालन करें। वह धारणा अब कायम नहीं है। पाकिस्तान यह उम्मीद नहीं कर सकता कि भारत संयम पर आधारित ढांचा बनाए रखे। जबकि वह स्टेट नीति के हथियार के तौर पर सीमा-पार आतंकवाद को बढ़ावा देता रहे।

पश्चिमी देशों की राजधानियों में नदी के बहाव की दिशा में नीचे की ओर बसे देश के अधिकारों के लिए पाकिस्तान की अपील भले ही प्रभावशाली हों लेकिन जांच-परख में टिक नहीं पाएंगी। उनमें ना तो कानूनी स्पष्टता है और ना ही नैतिक विश्वसनीयता है। भारत के लिए सही रास्ता यही है कि वह संधि को तब तक निलंबित रखे, जब तक कि वे हालात फिर से बहाल ना हो जाएं जिनकी वजह से यह संधि कायम थी।

भारत दे कड़ा संदेश

सिंधु संधि को स्थगित करने का महत्व नदी के बहाव को बदलने में नहीं बल्कि एकतरफा संयम की उस नीति को खत्म करने में है, जिसने भारत को अपने अधिकारों का पूरी तरह से इस्तेमाल करने से रोका था। सिंधु जल संधि को दुनिया की सबसे टिकाऊ सीमा-पार जल-साझाकरण तंत्र के रूप में जानी जाती है। लेकिन इसे बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों की जरूरत होती है। केवल ऊपरी तटवर्ती देश की ही पूरी जिम्मेदारी नहीं होती।

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