'J-10CE फाइटर्स के सामने खुल गई थी पोल', चीन के ग्लोबल टाइम्स ने भारत के 114 राफेल सौदे पर कसा तंज

Updated on 06-06-2026 01:07 PM
बीजिंग: चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के भोंपू ग्लोबल टाइम्स ने भारत के 114 राफेल लड़ाकू विमान डील पर तंज कसा है। इसने लिखा है कि पिछले साल पाकिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान जे-10सी विमानों के सामने कमजोरी उजागर होने के बाद भारत को राफेल को अपग्रेड करने की जरूरत है। ग्लोबल टाइम्स में एक लेख प्रकाशित किया गया है जिसमें बताया गया है कि राफेल खरीदने के पीछे भारत की 'अलग अलग देशों के साथ रिश्ता बनाने की कोशिश' और 'रणनीतिक चिंता' है।

इसने लिखा है कि फ्रांस के साथ करीब 33.9 अरब डॉलर का 114 राफेल खरीदने का डील भारत के इतिहास में सबसे बड़ी डिफेंस डील है जो 'अहम सौदा बड़ी ताकतों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और घरेलू रक्षा आत्मनिर्भरता हासिल करने की चिंताओं के बीच नई दिल्ली की रणनीतिक सोच को उजागर करता है।' ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि हालांकि ये सौदा बहुत कम समय में भारतीय वायुसेना की क्षमता को बढ़ा सकता है लेकिन लंबे समय में भारत के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भरता, घरेलू रक्षा विकास के रुकने और रणनीतिक रूप से कमजोर होने का खतरा भी है जब तक कि ऐसी खरीद से घरेलू सैन्य तकनीक में बड़ी सफलताएं न मिलें।

'कई देशों के साथ तालमेल बिठाने की रणनीति का हिस्सा'

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि 114 राफेल डील से क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन में किसी भी बदलाव के साथ पूरे क्षेत्र में सुरक्षा जोखिम भी बढ़ेंगे। भारत की राफेल खरीद असल में उसकी 'मल्टी-अलाइनमेंट' (कई देशों के साथ तालमेल बिठाने की) रणनीति का ही एक रक्षा विस्तार है। ऐतिहासिक रूप से भारतीय वायुसेना लंबे समय से रूसी उपकरणों पर निर्भर रहा है। लेकिन रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद से रूसी निर्यात में भारी गिरावट आई है और भारत को अपने हथियार आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने की प्रक्रिया तेज करनी पड़ी है। नई दिल्ली के नजरिए से फ्रांस के राफेल फाइटर जेट न सिर्फ 'बिना किसी शर्त के' तकनीक हस्तांतरण का लाभ देते हैं बल्कि एक ज्यादा मजबूत और विविध रक्षा आपूर्ति श्रृंखला बनाने में भी मदद करते हैं।

चीन के भोंपू ने आगे लिखा है कि इसके पीछे एक गहरी मंशा यह भी है कि भारत हथियारों की विविध खरीद के जरिए बड़ी ताकतों के साथ अपने संबंधों का संतुलन बनाना चाहता है। एक तरफ राफेल खरीदकर भारत फ्रांस के साथ अपनी 'रणनीतिक साझेदारी' को गहरा कर रहा है तो दूसरी तरफ वह रूस और अमेरिका दोनों के साथ रक्षा सहयोग बनाए हुए है। फ्रांस को एक 'बार्गेनिंग चिप' (मोल-भाव के साधन) के तौर पर इस्तेमाल करके भारत रूसी सैन्य उपकरणों और भारत के प्रति अमेरिका की रणनीति से जुड़ी दोहरी अनिश्चितताओं से खुद को सुरक्षित रख सकता है साथ ही बड़ी ताकतों की प्रतिद्वंद्विता में अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' की चाहत को भी दिखा सकता है।

'भारत के सामने कई रणनीतिक चिंताएं'

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि निष्पक्ष रूप से कहें तो हथियारों के इस बहुत बड़े सौदे के पीछे कई रणनीतिक चिंताओं का एक साथ उभरना मुख्य कारण है। इसमें बताया गया है कि भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों की संख्या तेजी से कम हो रही है और उसके पास सिर्फ 29 स्क्वाड्रन हैं जो मंजूर की गई 42 स्क्वाड्रन से काफी कम है। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत को राफेल जैसे 4.5-जेनरेशन फाइटर जेट्स की तुरंत जरूरत है जिनमें नेटवर्क-आधारित कॉम्बैट क्षमताएं और मजबूत इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर हों।

ग्लोबल टाइम्स ने भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान प्रोग्राम पर तंज कसा है और लिखा है कि तेजस के लिए इंजन मिलने में देरी से 'शर्मनाक स्थिति पैदा हो गई है।' जबकि तेजस Mk2 और एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम (AMCA) भी समय से पीछे चल रहे हैं जिससे भारत को रणनीतिक अंतरिम समाधान के तौर पर राफेल को चुनना पड़ा है। इसने लिखा है कि यह भारत के मिलिट्री एविएशन मैन्युफैक्चरिंग उद्योग की कमियों को भी उजागर करता है।

पाकिस्तान का नाम लेकर भारत पर निशाना

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि भारत में एक थ्योरी है 'दो मोर्चों पर रोकथाम' (चीन-पाकिस्तान से लड़ाई) लेकिन भारत के पास ये क्षमता अपर्याप्त है। इसने आगे लिखा है हालांकि भारतीय वायुसेना पाकिस्तान से आगे निकलने के लिए राफेल की सटीक हमला करने की क्षमता और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में बढ़त पर भरोसा करती है लेकिन पिछले मई में J-10CE के खिलाफ डॉगफाइट में सामने आई कमज़ोरियों ने इस प्लेटफॉर्म को तुरंत अपग्रेड करने की जरूरत को बढ़ा दिया है।

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