डॉलर, तेल, बॉन्ड, FII... चौतरफा मार से 100 की ओर बढ़ रहा रुपया, भारत के लिए फायदेमंद है या नुकसानदायक?

Updated on 10-10-2026 12:31 PM
नई दिल्ली: भारतीय रुपये की कीमत में हाल में डॉलर के मुकाबले काफी गिरावट आई और यह शतक पूरा करने के करीब पहुंच गया। रुपये में गिरावट के कई कारण हैं। इनमें डॉलर की मजबूती, तेल की कीमत में बढ़ोतरी, भारतीय बाजार से विदेशी निवेशकों की बिकवाली और यूएस ट्रेजरी यील्ड में तेजी शामिल है। रुपया शुक्रवार को अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले 17 पैसे मजबूत होकर 96.71 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। लेकिन हाल में रुपये में जिस तरह से गिरावट आई है, उसे देखते हुए माना जा रहा है कि रुपया आने वाले दिनों में 100 तक गिर सकता है।

सवाल यह है कि भारत की मजबूत पूंजी आकर्षित करने की क्षमता के बावजूद निवेशक रुपये में और गिरावट की आशंका क्यों देख रहे हैं? कई विश्लेषक हेजिंग पैटर्न और मुद्रा अनुमानों के आधार पर आगे भी रुपये के दबाव में रहने की संभावना जता रहे हैं। आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को कहा कि वित्तीय बाजार अल्पावधि में अक्सर तर्कसंगत तरीके से व्यवहार नहीं करते और कई संकेतक यह दर्शाते हैं कि भारतीय रुपया ओवरवैल्यूड नहीं बल्कि अंडरवैल्यूड हो सकता है।
एमपीसी की बैठक के बाद उन्होंने कहा कि बाजार की धारणा और करेंसी के बारे में निवेशकों की स्थिति हमेशा किसी करेंसी के वास्तविक मूल्य को नहीं दर्शाती। उन्होंने कहा, 'केवल लंबी अवधि में बाजार किसी करेंसी का सही मूल्य निर्धारित कर पाते हैं।' उनसे रुपये में लगातार हो रही गिरावट और करेंसी हेजिंग एक्टिविटीज के बारे में पूछा गया था। उन्होंने कहा कि करेंसी के वैल्यूएशन के लिए यूज किए जाने वाले कई मानक खासकर रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER) यह संकेत देते हैं कि रुपया ओवरवैल्यूड नहीं है, बल्कि संभव है कि यह अंडरवैल्यूड हो।

करेंसी के वैल्यूएशन के लिए यूज किए जाने वाले कई मानक खासकर रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER) यह संकेत देते हैं कि रुपया ओवरवैल्यूड नहीं है, बल्कि संभव है कि यह अंडरवैल्यूड हो।
संजय मल्होत्रा, आरबीआई गवर्नर

IMF की दलील

इस बीच इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने कहा है कि भारत रुपये पर दबाव झेलने के लिए काफी मजबूत है। IMF के एक प्रवक्ता ने शुक्रवार को सुझाव दिया कि यूएस फेडरल रिजर्व के इंटरेस्ट रेट बढ़ाने के फैसले से ग्लोबल फाइनेंशियल हालात और सख्त होंगे और भारत एक्सचेंज रेट को शॉक एब्जॉर्बर के तौर पर काम करने देगा। IMF की दलील का मतलब यह नहीं है कि रुपये का पूरी तरह बाजार की ताकतों पर छोड़ देना चाहिए।
IMF कुछ समय से लगभग यही बात कह रहा है। उसने पिछले साल भी कहा था कि एक्सचेंज-रेट फ्लेक्सिबिलिटी मुख्य शॉक एब्जॉर्बर होनी चाहिए। इसमें दखल सिर्फ अस्थिर करने वाले रिस्क प्रीमियम के समय तक ही सीमित रहना चाहिए। रुपये की कीमत कम होने देना, हस्तक्षेप बंद करने जैसा नहीं है। RBI तब भी डॉलर बेच सकता है जब मार्केट अस्त-व्यस्त हो जाएं, लिक्विडिटी गायब हो जाए या घबराहट बढ़ जाए। उसे यह साबित करने के लिए बड़ी मात्रा में रिजर्व खर्च करने की जरूरत नहीं है कि 96, 97 या 100... कौन सी एक अस्वीकार्य संख्या है।

चौकड़ी की चौतरफा मार

रुपये पर दबाव की एक बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमत में छिपी है। भारत अपना लगभग 90% कच्चा तेल इंपोर्ट करता है, इसलिए तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से ट्रेड बैलेंस बिगड़ता है और डॉलर की मांग बढ़ती है। कच्चा तेल पिछले कई दिनों से 100 डॉलर के पार बना हुआ है। कच्चे तेल की कीमत में 1 डॉलर की बढ़ोतरी भारत का सालाना आयात बिल करीब 18,000 करोड़ रुपये बढ़ा देती है।

तेल की कीमतों के अलावा डॉलर की मजबूती, यूएस बॉन्ड यील्ड और विदेशी आउटफ्लो एक साथ रुपये पर दबाव डाल रहे हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और 16वें फाइनेंस कमीशन के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया ने हाल ही में TOI को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि डेप्रिसिएशन जरूरी नहीं कि बुरा हो, क्योंकि भारतीय प्रोड्यूसर न सिर्फ विदेशी मार्केट में बल्कि भारत में इम्पोर्टेड प्रोडक्ट्स के साथ भी कॉम्पिटिशन करते हैं।
उन्होंने कहा कि मान लीजिए कि एक भारतीय मैन्युफैक्चरर कोई प्रोडक्ट 1,000 रुपये में बेच रहा है। अगर रुपया गिरता है, तो इम्पोर्टेड मशीनरी या कंपोनेंट्स ज्यादा महंगे हो सकते हैं। लेकिन उस मैन्युफैक्चरर के साथ कॉम्पिटिशन करने वाला इम्पोर्टेड फिनिश्ड प्रोडक्ट भी रुपये के हिसाब से ज्यादा महंगा हो जाता है। यही बात एक्सपोर्ट पर भी लागू होती है। कमजोर रुपया एक भारतीय एक्सपोर्टर को ज्यादा कॉम्पिटिटिव डॉलर प्राइस ऑफर करने की इजाजत दे सकता है।

कमजोर रुपये से फायदा या नुकसान

भारत कोई क्लासिक एक्सपोर्ट पर आधारित इकॉनमी नहीं है जो अपनी करेंसी के गिरने पर अमीर हो जाएगा। जापान, साउथ कोरिया और चीन के मामले में ऐसा हुआ है। लेकिन भारत के प्रोडक्शन का एक बड़ा हिस्सा खुद इम्पोर्टेड इनपुट पर निर्भर करता है। तेल इसका सीधा उदाहरण है। फर्टिलाइजर, खाद्य तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स के पुर्जे और कैपिटल गुड्स भी मायने रखते हैं। इससे एक अजीब सी स्थिति बनती है।
अगर आज रुपया गिरता है तो इससे आने वाले कल में क्रूड और इम्पोर्टेड पुर्जे और महंगे हो जाएंगे। लेकिन कमजोर करेंसी से एक्सपोर्ट का फायदा मिलने में महीनों या सालों लग सकते हैं। इससे महंगाई बढ़ सकती है। बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकनॉमिस्ट मदन सबनवीस ने हाल ही में ET को बताया है कि रुपया अगले साल 3-4% और गिर सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे इम्पोर्टेड महंगाई बढ़ती रहेगी।

100 का मतलब

एक्सिस बैंक के एक असेसमेंट के मुताबिक RBI ने 2023 के मध्य से रुपये को सपोर्ट करने के लिए लगभग $250 बिलियन बेचे हैं। एक्सिस का तर्क है कि बाहरी फंडामेंटल्स को अब और एडजस्टमेंट की जरूरत हो सकती है। जैसे-जैसे 100 के करीब पहुंच रहा है, वैसे-वैसे इस लेकर बहस तेज होती जा रही है। अरविंद पनगढ़िया का तर्क है कि 100 पर रुपया सिर्फ एक नंबर है और इससे पॉलिसी तय नहीं होनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो रुपये का बचाव करने से असल समस्या खत्म किए बिना ही रिजर्व खत्म हो जाएगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि 100 पर रुपया आर्थिक रूप से बेमतलब है। यह मनोवैज्ञानिक रूप से एक महत्वपूर्ण सीमा होगी और उम्मीदों पर असर डाल सकती है। लेकिन यह आर्थिक स्थिरता को संकट से अलग करने वाली कोई जादुई रेखा नहीं है। ज्यादा उपयोगी सवाल यह हैं कि क्या महंगाई काबू में रहेगी, क्या कैपिटल इनफ्लो बाहरी घाटे को फाइनेंस कर सकता है, क्या फॉरवर्ड ऑब्लिगेशन्स का हिसाब लगाने के बाद रिजर्व आरामदायक रहेगा और क्या एक्सचेंज रेट मोटे तौर पर भारत के बाहरी फंडामेंटल्स के अनुरूप है।
एक्सपर्ट्स और एनालिस्ट्स की राय के आधार पर समझदारी वाली पॉलिसी यह है कि एक्सचेंज रेट को बाहरी झटके का एक बड़ा हिस्सा झेलने दिया जाए, साथ ही पैनिक रोकने के लिए काफी रिजर्व और दखल देने की क्षमता भी बनी रहे। अगर रुपया आखिरकार 98 या 100 रुपये पर सेटल होता है तो यह एक एडजस्टमेंट होगा। जरूरी नहीं कि यह कोई संकट हो। बड़ा खतरा यह हो सकता है कि करेंसी स्क्रीन पर एक खास नंबर को पार नहीं किया जा सकता, यह साबित करने के लिए कम पॉलिसी का इस्तेमाल किया जाए।

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