एमपी के सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ी खुशखबरी: 10 साल बाद खुला पदोन्नति का रास्ता, लेकिन कोर्ट का आखिरी फैसला ही होगा सर्वोपरि

Updated on 01-07-2026 01:19 PM

भोपाल। प्रदेश में मई 2016 से बंद पदोन्नति का रास्ता अब खुल गया है। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन का अभिमत भेजा है। इसमें पदोन्नति की प्रक्रिया पर कोई रोक न होने की बात कही गई है। साथ ही यह भी बताया गया कि हाई कोर्ट में सरकार की ओर से जो मौखिक या अनौपचारिक आश्वासन दिया गया था, वह किसी न्यायिक आदेश में दर्ज नहीं है।

यह इस उम्मीद से दिया था कि शीघ्रता से मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम 2025 के प्रविधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं का निराकरण हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। परिस्थितियां बदल गई हैं और नई बेंच गठित होगी। इसमें समय लगने की संभावना है। पदोन्नति की प्रक्रिया की जा सकती है मगर ये हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी।

सामान्य प्रशासन विभाग के अपर सचिव अजय कटेसरिया ने सभी विभागों के सचिव, विभागाध्यक्ष और कलेक्टरों को इस अभिमत के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए कहा है। अभिमत में बताया गया कि वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने ही मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम 2025 के प्रविधान को चुनौती देने से संबंधित हाई कोर्ट में लंबित याचिकाओं पर सरकार का पक्ष रखा था।

उन्होंने कहा कि नियम की वैद्यता को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के पहले दिन यह मौखिक और अनौपचारिक आश्वासन दिया गया था कि कार्रवाई लंबित रहने के द्वारा पदोन्नति नहीं की जाएगी। इसे न तो किसी न्यायिक आदेश में दर्ज किया गया और न ही न्यायालय की किसी ऐसे निर्देश में शामिल किया गया, जिसमें राज्य को उसकी वैधानिक शक्तियां प्रयोग करने से रोका गया हो। 17 फरवरी 2026 को सुनवाई पूरी कर निर्णय सुरक्षित रख लिया गया। इस बीच एक न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय में पदस्थ किया गया तो दूसरे का तबादला हो गया। अब परिस्थितियां काफी बदल गई हैं। सुनवाई करने वाले दोनों न्यायाधीश अलग-अलग स्थानों पर पदस्थ हैं। नई पीठ गठित होगी और निर्णय शीघ्र आने की उम्मीद नहीं रह गई है। इसमें समय लगने की संभावना है।

विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक बुलाने पर रोक नहीं

अभिमत में बताया गया कि विभिन्न न्यायालयीन निर्णयों में यह पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि लंबित प्रकरण के चलते प्रक्रिया को नहीं रोका जा सकता है। मध्य प्रदेश राज्य बनाम विनय कुमार बाबेल प्रकरण में उच्च न्यायालय की पीठ द्वारा पारित आदेश में यह माना गया कि नियमों को चुनौती देने का मामला लंबित होने से राज्य सरकार को विभागीय पदोन्नति समिति की बुलाने पदोन्नति देने से रोक नहीं जा सकता है।

ऐसी पदोन्नति स्पष्ट रूप से न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन हो रहेगी यानी सशर्त होगी। हालांकि, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि यदि पदोन्नति अभी की जाती है और अंतिम निर्णय के कारण बाद में अनिश्चित हो जाती है तो इससे काफी प्रशासनिक व्यवधान उत्पन्न हो सकता है।

40 प्रतिशत अमले से ही चलाया जा रहा काम

सरकार की ओर से सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट को यह भी बताया जा चुका है कि वह अपनी स्वीकृत क्षमता के केवल 40 प्रतिशत पर ही कार्य कर रही है। पदोन्नति एक दशक से रुकी हुई हैं, जिसके कारण बड़ी संख्या में उच्च पद रिक्त पड़े हैं।

इससे कई विभागों के कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। गंभीर प्रशासनिक कठिनाइयां उत्पन्न हुई हैं। पदोन्नति न होने के कारण निचले पदों पर भर्ती में भी देर हुई क्योंकि पदोन्नति क्रम में रिक्तियां भरी नहीं गई। इन परिस्थितियों में नई सुनवाई पूरी होने तक पदोन्नति रोकना न तो व्यावहारिक है और ना ही व्यापक जनहित में है।


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