महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने फॉर्म-6 में बदलाव का प्रस्ताव चुनाव आयोग को भेजा है। इससे SSR में हटे वोटर दोबारा नाम जुड़वा सकेंगे।
प्रस्ताव में कहा गया है कि जो लोग वोटर लिस्ट में दोबारा नाम जुड़वाना चाहते हैं, ऐसे वोटरों से पहली बार वोटर बनने की घोषणा न कराई जाए। क्योंकि झूठी घोषणा पर एक साल तक जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
अधिकारियों का कहना है कि लोग इससे डर रहे हैं। कई BLO ने भी इस बात की शिकायत की है। यह प्रस्ताव पिछले हफ्ते भेजा गया।
महाराष्ट्र में SSR अभी चल रहा है। यहां ड्राफ्ट रोल से हटे पुराने वोटरों को भी Form-6 से नाम जुड़वाने को कहा जा रहा है।
फॉर्म-6 में पहली बार वोटर होने की घोषणा
फॉर्म-6 में अभी ये बताना होता है कि वह पहली बार मतदाता सूची में नाम जुड़वा रहा है। फॉर्म में ये जानकारी देनी की बात पहली बार जोड़ी गई है।
फॉर्म में यह भी घोषित करना होता है कि उसका नाम किसी विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल नहीं है।
फर्जी घोषणा करने पर जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 31 के तहत कार्रवाई हो सकती है। इसमें एक साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
पहले भी हो चुका फॉर्म-6 में बदलाव
चुनाव आयोग ने 10 अक्टूबर को SIR पूरा हो चुके राज्यों में फॉर्म-6 में बड़ा बदलाव किया था। अब SIR में नाम कटने के बाद दोबारा नाम जुड़वाने के लिए 2003 की वोटर लिस्ट की जानकारी नहीं देनी होगी।
आवेदक को यह बताने की जरूरत नहीं होगी कि उसका, माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस लिस्ट में था या नहीं। फॉर्म-6 से इससे जुड़ा अतिरिक्त घोषणा-पत्र हटा दिया गया है।
एमपी-यूपी सहित 17 राज्यों-UT में वोटर लिस्ट अपडेट होगी
चुनाव आयोग ने गुरुवार को 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में वोटर लिस्ट का स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) कराने का निर्देश दिया है। इनमें मध्यप्रदेश, यूपी, पंजाब , गोवा और उत्तराखंड भी शामिल हैं, यहां अगले साल विधानसभा चुनाव हैं।
यह आदेश ऐसे समय आया है, जब स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर विपक्ष देशभर में विरोध-प्रदर्शन कर रहा है और मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
SSR के तहत वोटर लिस्ट में नए नाम जोड़े जाएंगे और पहले से दर्ज जानकारी में गलतियां सुधारी जाएंगी। 2027 में 18 साल की उम्र पूरी करने वाले युवा भी नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकेंगे। नाम जोड़ने, हटाने की जानकारी राजनीतिक दलों को दी जाएगी।
SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को लेकर विवाद 24 जून 2025 को शुरू हुआ, जब चुनाव आयोग ने बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का आदेश दिया।
आयोग का कहना था कि इसका उद्देश्य वोटर लिस्ट को दुरुस्त करना और पात्र मतदाताओं के नाम शामिल करना है, लेकिन विपक्ष ने आरोप लगाया कि दस्तावेजों की शर्तों और कम समय के कारण बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम भी कट सकते हैं। अगस्त 2025 में बिहार की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब 65 लाख नाम बाहर होने के बाद विवाद और बढ़ा।
इसके बाद SIR दूसरे राज्यों तक पहुंचा और नागरिकता की जांच, पुराने रिकॉर्ड की अनिवार्यता, नाम हटाने की प्रक्रिया तथा चुनाव आयोग की शक्तियों को लेकर सवाल उठे।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसने 27 मई 2026 को बिहार में SIR कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को बरकरार रखा। सितंबर-अक्टूबर 2026 में फॉर्म-6 में SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा और आयोग के भीतर कथित असहमतियों को लेकर नया विवाद खड़ा हुआ।
अब चुनाव आयोग ने SIR पूरा कर चुके 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में छूटे पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने को कहा है।
12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक विपक्ष के मार्च मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि कोई भी कोर्ट को डरा-धमकाकर दबाव में नहीं ला सकता। ऐसी कोशिशें बेकार हैं। इन पर कोई ध्यान नहीं देता।