नई दिल्ली: भारतीय फुटबॉल का इतिहास अधूरी उम्मीदों और गंवाए गए सुनहरे मौकों की कहानियों से भरा पड़ा है। लेकिन इनमें से कोई भी कहानी उतनी कचोटने वाली नहीं है, जितना कि साल 1950 में ब्राजील में हुए फीफा वर्ल्ड कप के दौरान हुआ था। भारत ने इस वर्ल्ड कप के लिए आधिकारिक तौर पर क्वालीफाई कर लिया था, लेकिन इसके बावजूद भारतीय फुटबॉल महासंघ ने इस ऐतिहासिक मौके से अपने कदम पीछे खींच लिए। यह फैसला भारतीय फुटबॉल के इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य बनकर रह गया। कई खेल पंडितों का मानना है कि अगर 1950 में भारतीय टीम ब्राजील चली जाती, तो शायद भारतीय फुटबॉल का वही कायाकल्प हो जाता जो 1983 में कपिल देव और उनकी टीम ने वर्ल्ड कप जीतकर भारतीय क्रिकेट के लिए किया था।बिना कोई मैच खेले भारत ने कैसे किया था वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई?
साल 1950 का फीफा वर्ल्ड कप दूसरे विश्व युद्ध के बाद आयोजित होने वाला पहला विश्व कप था। उस दौर में विश्व युद्ध की आर्थिक तबाही के कारण इंटरनेशनल यात्राएं बेहद महंगी और जटिल हुआ करती थीं। दक्षिण अमेरिका की यात्रा करने के लॉजिस्टिक बोझ के कारण कई देशों ने टूर्नामेंट से अपने नाम वापस ले लिए थे। क्वालीफिकेशन प्रक्रिया के तहत कुल 34 टीमों में से 16 टीमों का चयन होना था, जिसमें आजाद भारत पहली बार शामिल हुआ था। भारत को बर्मा (अब म्यांमार), इंडोनेशिया और फिलीपींस के साथ एशियाई क्वालीफाइंग ग्रुप में रखा गया था। लेकिन क्वालीफायर्स शुरू होने से ठीक पहले अन्य सभी तीनों टीमों ने अपने नाम वापस ले लिए, जिसके नतीजे में भारतीय पुरुष फुटबॉल टीम को बिना कोई मैच खेले ही 1950 फीफा वर्ल्ड कप का सीधा टिकट मिल गया। भारत को बकायदा आधिकारिक ड्रॉ में इटली, स्वीडन और पराग्वे के साथ ग्रुप-3 में जगह भी मिल गई थी, लेकिन 28 जून को होने वाले अपने पहले मैच में भारतीय टीम कभी मैदान पर उतरी ही नहीं।क्या सच में नंगे पैर खेलने की पाबंदी के कारण भारत ने नाम वापस लिया था?
फुटबॉल गलियारों में सालों से एक सबसे बड़ा मिथक तैरता रहा है कि FIFA ने भारतीय खिलाड़ियों को नंगे पैर खेलने की अनुमति देने से मना कर दिया था, इसलिए भारत ने टूर्नामेंट छोड़ दिया। दरअसल, 1948 के लंदन ओलंपिक्स में भारतीय टीम ने दिग्गज फ्रांस की टीम को कड़ी टक्कर दी थी, जहां कप्तान तालिमेरन आओ सहित भारत के कई खिलाड़ी अपने पैरों पर पट्टियां बांधकर नंगे पैर खेले थे। इस ऐतिहासिक दृश्य के कारण नंगे पैर खेलने पर पाबंदी वाली थ्योरी को बहुत हवा मिली। लेकिन हकीकत यह है कि यह सिर्फ एक अफवाह थी। फीफा ने साल 1953 तक जूते अनिवार्य करने का कोई नियम ही नहीं बनाया था और भारत ने इसके बाद 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक्स में भी बिना किसी आपत्ति के नंगे पैर फुटबॉल खेला था।
तो आखिर क्यों भारत नहीं गया ब्राजील? ये थीं असली वजहें
भारत के वर्ल्ड कप न खेलने के पीछे जूतों की पाबंदी नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढुलमुल रवैया, प्राथमिकताओं का टकराव और वित्तीय तंगहाली असली वजहें थीं। उस दौर में भारत जैसे नए आजाद देश के लिए अपनी फुटबॉल टीम को दुनिया के दूसरे कोने भेजना एक बेहद खर्चीला और भारी काम था। हालांकि फीफा और ब्राजीलियाई महासंघ ने मदद का भरोसा दिया था, लेकिन बात नहीं बन सकी। कोलकाता में हुई बैठक के बाद AIFF ने आधिकारिक प्रेस रिलीज जारी कर कहा कि देर से सूचना मिलने के कारण टीम चयन और तैयारी के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा है, इसलिए टीम नहीं भेजी जा रही।इसके अलावा तत्कालीन AIFF अध्यक्ष मोइन-उल-हक को डर था कि पेशेवर यूरोपीय और दक्षिण अमेरिकी टीमों के सामने भारत की नई टीम को बड़ी हार का सामना करना पड़ सकता है, जिससे 1948 ओलंपिक्स में बनी भारत की साख मिट्टी में मिल जाएगी। साथ ही उस समय भारत में घरेलू फुटबॉल मैच 90 मिनट के बजाय केवल 70 मिनट के खेले जाते थे, जिससे खिलाड़ियों की इंटरनेशनल स्तर की फिटनेस और एंड्योरेंस पर भी संदेह था।