
देश के किसी भी राज्य में जिला प्रशासन से लेकर सरकारी विभाग के अधिकारियों की आपराधिक लापरवाही के चलते यदि किसी हादसे में बड़ा संख्या में लोग मरते हैं तो इसके लिए अधिकारियों को भी सजा मिलनी चाहिए और मंत्रियों को भी नही बख्शा जाना चाहिए। किसी भी राज्य में जानो-माल की रक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है, जिला प्रशासन की है तो यह तो देखा ही जाना चाहिए कि राज्य सरकार व जिला प्रशासन ने लापरवाही के चलते होने वाले हादसे रोकने के लिए कोई योजना बनाई या नहीं, योजना बनाई है तो उसके हिसाब से राज्य में भीड़ वाली जगहों पर जहां भी बड़े हादसे हो सकते हैं, जांच की गई है या नहीं। यह देखा गया है क्या कि वहां लोगों की सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था की गई है या नही।
हर सरकारी विभाग के अधिकारियों को हर साल एक पूरा शेडयूल बनाना चाहिए कि किस महीने कहां कहां हादसे रोकने के लिए क्या जांच की जाएगी। फैक्ट्री, माल, कोचिंग, टाकीज,मैरिज हाल,गेमिंग जोन आदि बहुत सी जगहें होती है, यहां हमेशा बड़ी संख्या में लोग रहते है, अगर इनकी नियमित हर साल जांंच हो तो बहुत सारे बड़े हादसों को रोका जा सकता है। बहुत सारे लोगों की जान बचाई जा सकती है। बड़े हादसे होते ही इसलिए हैं कि हर स्तर पर आपराधिक लापरवाही होती है।इसके लिए किसी एक को दोषी मानकर सजा दे दी जाती है तथा उन लोगों को छोड़ दिया जाता है जो इस हादसे के लिए पर्दे के पीछे दोषी होते हैं। हर हादसे के पीछ सामूहिक लापरवाही होती है, हर हादसे को रोकने जैसे सामूहिक जिम्मेदाीर है, वैसी ही हर बड़े हादसे के पीछे कई लोग होते हैं, सामूहिक लापरवाही के लिए सभी को न्यूनाधिक सजा मिलनी चाहिए। बड़े हादसे के लिए जो प्रत्यक्ष दोषी साबित होते है, उनको कड़ी सजा मिलनी चाहिए और जो अप्रत्यक्ष रुप से जिम्मेदार हैं, उनको कम सजा मिलनी चाहिए। ताकि वह फिर वैसी लापरवाही न करें।
चाहे राजकोट के गेमिंंग जोन का हादसा हो, चाहे दिल्ली में नवजातों की मौत का मामला हो, चाहे इसके पहले मोरबी पुल हादसा हो, चाहे कोटिंग सेंटर में हुआ हादसा हो,चाहे बेमेतरा बारूद फैक्ट्री में हुआ हादसा हो। सरकार व जिला प्रशासन की नींद हादसे के बाद टूटती है और वह कुछ जगहों पर जांच की औपचारिकता पूरी कर बताती है कि वह सजग है। कहीं पर कोई बड़ा हादसा न हो तो जिला प्रशासन के अधिकासी सोए रहते है। जैसे गुजराते राजकोट के बच्चों के गेमिंग जोन में आग लगने से २८ लोगों की मौत हो गई तो रायपुर के अधिकारियों ने यहां के गेमिंग जोन मेें भी वही सुरक्षा संबंधी लापरवाही पाई गई यानी लोगों की जान बचाने के पर्याप्त इंतजाम ही नहीं थे। अगर आग लग जाए तो बाहर का कोई रास्ता ही नही। अगर राजकोट की घटना नहीं होता तो राजधानी के लोगों को पता ही नहीं चलता कि राजधानी के गेमिंग जोन भी असुरक्षित हैं।
जहां भी लोगों की भीड़ जुटती है, उनकी जान की सुरक्षा करना पहले तो उस जगह के मालिक की जिम्मेदारी है, प्रबंधन की है।उसके बाद वह जगह लोगों के लिए सुरक्षित है या नहीं यह जाच करना जिला प्रशासन व सरकारी विभाग का काम है। अगर कोई जगह असुरक्षित है तो उसकी जानकारी मीडिया के जरिए आम लोगों को दी जानी चाहिेए ताकि वह ऐसा असुरक्षित जगहों पर न खुद जाएं और न ही बच्चों को ले जाए।कोचिंग,टाकीज, माल,गेमिंग जोन के मालिक के साथ जिला प्रशासन की भी जिम्मेदारी है कि सार्वजनिक स्थलों को हर तरह से सुरक्षित बनाया जाए। इसी साथ पालकों की भी जिम्मेदारी है कि जहां भी बहुत ज्यादा भीड़ होने की आशंका हो उनको अपने बच्चों को लेकर नहीं जाना चाहिए और जाते है तो उनको सबसे पहेल यह देखना चाहिए जगह कितनी सुरक्षित है। कोई हादसा हो जाए तो जान बचाने के क्या इंतजाम है।
सरकार की तरह जज भी जब बड़ा हादसा हो जाता है तो खुद संज्ञान लेते है।उन्हें जो हादसा हो जाने के बाद कहना है, उसकी जगह वह भी शहर के सार्वजनिक स्थलों को देखने जा सकते हैं और देख सकते है, बता सकते है,यह जगह कितनी सुरक्षित है या कितनी असुरक्षित है। वह हादसे होने के बाद हादसे पर बोलने वाले बने रहते हैं। उन्हेंं भी जिला प्रशासन व सरकार की तरह हादसा होने से पहले हादसा रोकने वाला बनकर दिखाना चाहिए।