तब सुषमा अब जयशंकर, 9 साल-दो तस्वीरें...तब बड़ा मौका चूका था पाकिस्तान, क्या अब सुधरेगा?

Updated on 16-10-2024 01:34 PM
नई दिल्ली : एक ही जगह- पाकिस्तान। दो तस्वीरें। 9 साल का गैप। एक तस्वीर 2015 की। तब तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पीछे-पीछे बतौर विदेश सचिव चलते दिख रहे एस. जयशंकर। दूसरी तरफ खुद जयशंकर की जो बतौर विदेश मंत्री पूरे ठसक के साथ दिख रहे हैं। सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान को द्विपक्षीय संबंधों में सुधार का बड़ा मौका दिया था। तब द्विपक्षीय बातचीत भी हुई थी लेकिन पाकिस्तान पीठ में छुरा घोंपने की अपनी फितरत से कहां बाज आता। उसने छुरा घोंपा और दोस्ताना रिश्तों की संभावनाओं को मसल दिया। अब 9 साल बाद वही पाकिस्तान द्विपक्षीय बातचीत के लिए छटपटा रहा। जयशंकर ने तो पहले ही दो टूक साफ कर दिया कि कोई द्विपक्षीय बातचीत नहीं लेकिन तब भी ये भारतीय विदेश मंत्री का ये दौरा पाकिस्तान के लिए मौका हो सकता है। मौका भारत के साथ संबंध सुधारने का। मौका तनाव कम करने का। मौका द्विपक्षीय व्यापार के फिर शुरू होने की उम्मीदों को पंख देने का, अर्थव्यवस्था की डूबती नांव को साहिल तक पहुंचाने का।

सबसे पहले बात सुषमा स्वराज के दिसंबर 2015 के पाकिस्तान दौरे की। तत्कालीन विदेश मंत्री अफगानिस्तान पर हुए सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने गई थीं। उसमें 14 देशों ने हिस्सा लिया था। सुषमा स्वराज ने तब पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बातचीत भी की। तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ और तबके विदेश मंत्री सरताज अजीज से मुलाकातें हुईं।

तब एस. जयशंकर भी सुषमा स्वराज के साथ पाकिस्तान गए थे। बतौर विदेश सचिव। तस्वीर में वह स्वराज के पीछे चलते दिख रहे हैं। 9 साल बाद अब एस जयशंकर विदेश मंत्री की हैसियत से पाकिस्तान पहुंचे हैं। एससीओ की मीटिंग के लिए। अपनी स्पीच में उन्होंने बिना नाम लिए चीन और पाकिस्तान को घेरा और नसीहतें भी दी। नसीहत ये कि आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ से बचना होगा। नसीहत संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की। नसीहत ये कि अगर सहयोग में विश्वास की कमी है तो दोस्ती नहीं हो सकती। अगर पड़ोसी धर्म नदारद है तो अंदर झांकने की जरूरत है। 9 साल का एक बड़ा फर्क ये है कि तब सुषमा स्वराज ने द्विपक्षीय बातचीत के जरिए पाकिस्तान को मौका दिया था, लेकिन इस बार उससे कोई बातचीत नहीं। बस पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ से 20 सेकंड का हैंडसेक।

तब पाकिस्तान दौरे से लौटने के बाद सुषमा स्वराज ने अपनी यात्रा को लेकर संसद में बयान दिया था। उन्होंने बताया था कि कैसे उनका दौरा दोनों देशों के बीच संबंधों में गर्माहट का आधार बन सकता है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री सरताज अजीज से सुषमा की मुलाकात के बाद 9 दिसंबर को इस्लामाबाद में जारी हुए जॉइंट स्टेटमेंट में कॉम्प्रिहेंसिव बाइलेटरल डायलॉग का ऐलान किया गया था।

सुषमा स्वराज का पाकिस्तान दौरा बेपटरी रिश्तों को पटरी पर लाने का एक बड़ा मौका हो सकता था। लेकिन जो अपनी हरकतों से बाज आ जाए वो पाकिस्तान कहां। एक महीने भी नहीं बीते कि पठानकोट एयरबेस पर पाकिस्तानी आतंकियों ने हमला कर दिया। रिश्तों के सामान्य होने की रही-सही उम्मीदें तब जमींदोज हो गईं जब सितंबर 2016 में उरी में आतंकी हमला हुआ। जवाब में भारत को सर्जिकल स्ट्राइक करना पड़ा। मोदी सरकार ने साफ कर दिया कि आतंक और बातचीत दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान को बातचीत के लिए, द्विपक्षीय संबंधों के सामान्य होने के लिए आतंकवाद को औजार के रूप में इस्तेमाल करना छोड़ना ही होगा।

भारत का ये रुख अब भी वही है। 9 साल बाद भारत का कोई विदेश मंत्री पाकिस्तान गया लेकिन द्विपक्षीय बातचीत नहीं हुई। एस. जयशंकर ने दौरे से पहले ही साफ कर दिया था कि यात्रा बहुपक्षीय बातचीत के लिए है, द्विपक्षीय बातचीत के लिए नहीं। हालांकि, उनके इस दौरे ने संदेश जरूर दिया है कि भारत पड़ोसी देशों से संबंधों में स्थिरता चाहता है।

पाकिस्तान में भारत के हाई कमिश्नर रहे अजय बिसारिया ने हॉन्ग कॉन्ग के एक न्यूजपेपर साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से बातचीत में जयशंकर के पाकिस्तान दौरे को दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने का अहम मौका बताया था। उन्होंने कहा था, 'भारत ने एक मंत्री को भेजने का फैसला कर संदेश दिया है कि वह अपने पड़ोसी से संबंधों में स्थिरता चाहता है। दोनों देश संबंधों की शुरुआत अपने-अपने हाई कमिश्नर भेजकर कर सकते हैं। इसके अलावा ट्रेड भी शुरू हो सकता है।'

अब पाकिस्तान के ऊपर है कि वह भारत के संदेश को कितनी गंभीरता से लेता है। द्विपक्षीय संबंध का सामान्य होना आखिरकार उसी के हित में है। भारत को अगर वह द्विपक्षीय व्यापार के लिए मना लेता है तो उसकी डूबती अर्थव्यवस्था को एक सहारा मिल सकता है। तब सुषमा के दौरे पर पाकिस्तान ने सुनहरा मौका गंवा दिया था, अब 9 साल बाद उसे एक और मौका मिला है।

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