सबसे बुरा दौर आना बाकी, 'अदृश्य' संकट से 38 करोड़ भारतीय रूबरू, अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी
Updated on
27-04-2026 05:49 PM
नई दिल्ली: भारत में भीषण गर्मी अब सिर्फ एक मौसमी घटना नहीं रह गई है। इसके बजाय यह तेजी से बड़ा संकट बनती जा रही है। इसके कारण अभूतपूर्व पैमाने पर लोगों की जान, रोजगार और आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा पैदा होने लगा है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सलाटा इंस्टीट्यूट की नई रिपोर्ट एक कड़वा सच सामने रखती है। इसका शीर्षक है- भारत में अत्यधिक गर्मी पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण। इसमें कहा गया है कि गर्मी पहले से ही भारत का सबसे जानलेवा जलवायु खतरा बन चुकी है। अभी तो सबसे बुरा दौर आना बाकी है।
चौंकाने वाले हैं आंकड़े
रिपोर्ट में आंकड़े चौंकाने वाले हैं। भारत के लगभग तीन-चौथाई कामगार यानी करीब 38 करोड़ लोग, ऐसे कामों में लगे हैं जहां उन्हें सीधे गर्मी का सामना करना पड़ता है। इनमें खेती-बाड़ी, कंस्ट्रक्शन वर्क और असंगठित क्षेत्र शामिल हैं। इसकी भारत की जीडीपी में लगभग आधी हिस्सेदारी रखते हैं।
यह ट्रेंड चिंताजनक है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि 2030 तक ही 20 करोड़ तक भारतीयों को जानलेवा गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। यह इस बात को दिखता है कि खतरा कितनी तेजी से बढ़ रहा है।
सबसे खतरनाक संकट का 'अदृश्य' होना
इस संकट को जो बात खास तौर पर खतरनाक बनाती है, वह है इसका अदृश्य होना।
बाढ़ या तूफान के उलट गर्मी रातों-रात किसी बुनियादी ढांचे को तबाह नहीं करती।
इसके बजाय यह धीरे-धीरे प्रोडक्टिविटी, हेल्थ, और इनकम को कमजोर करती जाती है।
रिपोर्ट एक सीधा-सपाट आकलन पेश करती है: 'अत्यधिक गर्मी के प्रभाव बिखरे हुए, धीरे-धीरे जमा होने वाले और ऐसे अदृश्य होते हैं कि सरकारें और वित्तीय प्रणालियां जिस तरह से नुकसान का आकलन करती हैं, उसमें ये पकड़ में ही नहीं आते।'
क्या है इसका मतलब?
इसका मतलब यह है कि गर्मी की असली आर्थिक कीमत को जान-बूझकर कम करके आंका जाता है।
इस आर्थिक कीमत में काम के घंटों का नुकसान, घटती उत्पादकता और स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता बोझ शामिल है।
भारत पर गर्मी का खतरा सिर्फ बढ़ते तापमान तक ही सीमित नहीं है।
इसके बजाय यह इस बात से भी जुड़ा है कि लोग कहां और कैसे रहते-सहते और काम करते हैं।
घनी आबादी वाले शहर, गर्मी को सोखने वाली इमारतें, कूलिंग की सीमित सुविधाएं और कमजोर स्वास्थ्य प्रणालियां इस संकट को और भी गंभीर बना देती हैं।
भारत के लिए खतरा क्यों है?
रिपोर्ट एक अहम कमी की ओर इशारा करती है। भारत के सिर्फ 8 फीसदी घरों में ही एयर कंडीशनिंग (AC) की सुविधा उपलब्ध है। ऐसे में बाकी विशाल आबादी को बेहद अपर्याप्त साधनों के सहारे ही इस भीषण गर्मी का सामना करना पड़ता है।
यह असमानता गर्मी के मुद्दे को एक 'वर्गीय समस्या' में तब्दील कर देती है, जहां जिंदा रहने की संभावना ही इस बात पर निर्भर करती है कि किसी के पास ठंडक पाने के साधन उपलब्ध हैं या नहीं। यह खतरा कम होने के बजाय और भी तेजी से बढ़ रहा है।
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