सम्राट चौधरी के कैबिनेट में जाति और इलाके का गणित, NDA की सोशल इंजीनियरिंग का बड़ा दांव

Updated on 08-05-2026 11:47 AM
पटनाः बिहार में सीएम सम्राट चौधरी की अगुवाई में मंत्रिमंडल के विस्तार में एनडीए ने जाति और इलाके की गणित को साधने की कोशिश की है और सोशल इंजीनियरिंग को ध्यान में रखा है। इसे एनडीए की गहरी सामाजिक-राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। मंत्रिमंडल में शामिल चेहरे से साफ है कि बीजेपी ने जेडीयू, एलजेपी, हम और आरएलएम के साथ मिलकर जातीय और क्षेत्रीय बैलेंस बनाने का प्रयास किया है।

इस तरह से कैबिनेट विस्तार हुआ है कि एक तरफ जहां एनडीए का पारंपरिक वोट बैंक को सुरक्षित रखा जाए और दूसरी ओर उन सोशल ग्रुप में पैठ बनाने का प्रयास है जो आरजेडी और अन्य पार्टियों के वोट बैंक के तौर पर जाने जाते रहे हैं। महिला रिजर्वेशन को लेकर एनडीए मुखर रही है और इस बार बिहार के कैबिनेट विस्तार में पांच महिलाओं को जगह दी गई है।

जातीय समीकरण....


जो मंत्री बने हैं उनमें यादव ब्राह्मण, भूमिहार, वैश्य, निषाद, पासवान, चंद्रवंशी और दलित समूहों को साधने की कोशिश साफ दिखती है। बिहार की सामाजिक संरचना में यादव समुदाय की हिस्सेदारी करीब 14 प्रतिशत मानी जाती है। यादव काफी समय से आरजेडी का मुख्य वोट बैंक है। कैबिनेट में रामकृपाल यादव को जगह देना यादव वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश है। पटना और मध्य बिहार में रामकृपाल यादव का प्रभाव है और इस तरह एनडीए ने एक बड़ा स्टेप लिया है। अति पिछड़ा और गैर यादव पिछड़ों पर भी बीजेपी की नजर है।

रमा निषाद के जरिए निषाद-मल्लाह ग्रुप को संदेश दिया गया है, जो उत्तर बिहार, कोसी आदि इलाके में प्रभावी रहे हैं। चंद्रवंशी-कहार समूह से प्रमोद चंद्रवंशी जैसे नाम कैबिनेट में हैं। लखविंदर पासवान और नंद किशोर राम जैसे नाम दलित और पासवान सामाजिक आधार को मजबूत करने की ओर पहल है। वहीं बीजेपी ने नीतीश मिश्रा और मिथिलेश तिवारी जैसे ब्राह्मण चेहरों के जरिये सवर्ण प्रतिनिधित्व के लिए संतुलन बनाने की कोशिश की है। विजय कुमार सिन्हा भूमिहार समाज का बड़ा चेहरा माने जाते हैं। दिलीप जायसवाल वैश्यप्नि समाज से आते हैं। बीजेपी ने इस तरह से देखा जाए तो अपने पारंपरिक आधार को भी मद्देनजर रखा है।

जेडीयू में पुरानी सोशल इंजीनियरिंग पर जोर


जदयू के कोटे से अगर मंत्रियों को देखें तो नीतीश कुमार की पुरानी सोशल इंजीनियरिंग को ध्यान में रखा गया है। श्रवण कुमार, मदन सहनी, भगवान सिंह कुशवाहा, बुलो मंडल, शीला मंडल, रत्नेश सदा और जमा खान जैसे नाम कैबिनेट में शामिल किए गए हैं। इस तरह देखा जाए तो जेडीयू कुर्मी, कुशवाहा, अति पिछड़ा, महादलित और पसमांदा मुस्लिम समूहों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है।

नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की मौजूदगी सिर्फ पारिवारिक उत्तराधिकार का संकेत नहीं है। इसके जरिये कुर्मी वोट बैंक को इमोशनल और पॉलिटिकल तौर पर जोड़े रखने का संकेत है। बुलो मंडल और मदन सहनी गैर-यादव पिछड़े वर्ग से आते हैं और इस तरह पिछड़े वर्ग को इनके जरिये प्रतिनिधित्व दिया गया है। रत्नेश सदा महादलित समुदाय के लिए संदेश हैं। अशोक चौधरी दलित राजनीति में जदयू की हिस्सेदारी में मजबूती पैदा करते हैं। जमा खान का शामिल होना सीमित मुस्लिम प्रतिनिधित्व है लेकिन यह खासकर पसमांदा मुस्लिम समाज के लिए मैसेज है साथ ही सीमांचल के लिए यह संदेश है।

एलजेपी के जरिये पासवान वोट बैंक


लोजपा (रामविलास) से संजय पासवान और संजय सिंह को जगह देकर NDA ने पासवान वोट बैंक को साधा है। चिराग पासवान का मुख्य सामाजिक आधार भी यही है। हम पार्टी से संतोष सुमन के जरिये महादलित समूहों को साधने का प्रयास है। इसके जरिये मध्य विवाह औरंगाबाद, जहानाबाद और दक्षिण बिहार में प्रभाव बनाने का प्रयास है। उपेंद्र कुशवाहा खेमे से दीपक प्रकाश को शामिल करना कुशवाहा-कोइरी वोटों में NDA की पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

क्षेत्रीय संतुलन पर भी जोर


बिहार के कैबिनेट विस्तार पर नजर डालें तो जातीय समीकरण के साथ साथ क्षेत्रीय बैलेंस भी बनाने की पूरी कोशिश हुई है। उत्तर बिहार, मिथिलांचल, मगध, सीमांचल, भोजपुर और मध्य बिहार सहित तमाम इलाकों से प्रतिनिधित्व दिया गया है। अलग-अलग क्षेत्रों के नेताओं को कैबिनेट में शामिल किया गया है और एनडीए यह संदेश देने का प्रयास कर रही है कि इलाकाई संतुलन को तरजीह दी गई है और बिहार में नई सरकार में हर वर्ग और हर इलाके की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास हुआ है।

तीन बड़े संदेश


RJD के MY समीकरण में सेंध लगाने के लिए यादव और पसमांदा मुसलमान को जोड़ा गया
EBC, महादलित, पासवान, निषाद, कुशवाहा और गैर-यादव पिछड़ों को कैबिनेट में जगह
सवर्ण और वैश्य जैसे पारंपरिक NDA वोटरों को भी बराबर का सम्मान दिया गया

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