सुप्रिया पाठक बोलीं- 80 के दशक में न वॉशरूम, व वैनिटी वैन होते थे, हम घास की गठरियों पर आराम करते

Updated on 09-03-2026 04:13 PM
80 के दशक में फिल्मों के सेट के हालात आज के समय से काफी अलग होते थे। उन दिनों फिल्म स्टार्स के लिए उतनी सुविधाएं फिल्मी सेट पर नहीं हुआ करती थीं जितनी अब होती हैं।'खिचड़ी' एक्ट्रेस सुप्रिया पाठक ने 80 के दौर के फिल्म सेट की कहानी सुनाई और बताया कि तब वॉशरूम, वैनिटी वैन या आराम करने के लिए उचित जगह जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी कैसा अभाव रहा करता था।

शाहिद कपूर की सौतेली मां सुप्रिया पाठक ने 'मिर्च मसाला' की शूटिंग के दौरान का एक किस्सा सुनाया। इस फिल्म की शूटिंग के लिए मिर्च फैक्ट्री में बिताए अपने अनुभव को शेयर किया और बताया कि कैसे एक दर्जन महिलाएं वहां घास और भूसे के गठरियों पर आराम करती थीं। हालांकि, 'खिचड़ी' एक्ट्रेस ने कहा कि इस तरह के माहौल में काम करने के पीछे की वजह एक्टर्स का जुनून होता था।

80 से 90 के दशक में कैसा होता था फिल्मों का सेट

'बॉलीवुड बबल' के साथ अपनी बातचीत में सुप्रिया ने 80 से 90 के दशक में फिल्म इंडस्ट्री को लेकर बातें करते हुए बताया कि तब कैसे एक्टर्स वैनिटी वैन के बिना काम करते थे। उन्होंने कहा, 'जो जुनून था हमारे अंदर एक्टिंग का या किरदार बनाने का, उसकी वजह से बाकी सारी चीजों की अहमियत कम लगती थीं। पर धीरे-धीरे एहसास हुआ कि नहीं, ये भी जरूरी है।'

सुप्रिया पाठक बोलीं- आपको एक बाथरूम की सुविधा होनी चाहिए

उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा, 'आपको कोई एक बैठने की जगह चाहिए और खासकर महिलाओं के लिए, आपको एक बाथरूम की सुविधा होनी चाहिए। मतलब मैं आज भी कहती हूं कि कितनी जगहों पर हम शूट करने जाते जहां बाथरूम भी मुहैया नहीं कराया जाता या होता ही नहीं था। कई जगहों पर जहां हम शूटिंग करते, बाथरूम जैसी बुनियादी सुविधाएं या तो उपलब्ध नहीं कराई जाती या होती ही नहीं थी।'

'लग्जरी नहीं, ये जरूरतें थीं'

सुप्रिया ने आगे कहा, 'तो फिर धीरे-धीरे एहसास होने लगेगा कि ये सारी जरूरतें हैं। ये हम लग्जरी के नजरिए से नहीं बोल रहे हैं, हम जरूरत के नजरिए से बोल रहे हैं। तो उस तरह से थोड़ा-थोड़ा, मुझे लगता है, सब सख्ती बरतने लगे तब बदलाव आने लगा। प्रड्यूसर्स को भी एहसास होने लगा कि हां यार, ये सारी चीजें तो होनी चाहिए।'

'हम सचमुच कहीं भी, कुछ भी करके बैठ जाते थे'

पाठक ने कहा, 'एक एक्टर के लिए जैसे हमारे वहां स्पॉट बॉय होते थे, चाय लाना, अगर आप सर्दी में शूट कर रहे हो, कहीं भी शूट कर रहे हो तो बुनियादी सुविधाएं तो चाहिए ही। खाना, पानी, चाय, ये सब बेसिक चीजें जरूरी होती हैं। फिर मुझे लगता है कि धीरे-धीरे ये सारे बदलाव होंगे। हमारी इंडस्ट्री में आने लगे। आज शूटिंग करना काफी कंफर्टेबल होगा, चाहे आप कहीं भी हों। पहले के टाइम से काफी अलग है। हमारा वक्त तो हम सचमुच कहीं भी, कुछ भी करके बैठ जाते थे। '

'घास के बड़े-बड़े बंडल पर हम पूरे दिन बैठते थे'

सुप्रिया पाठक ने कहा, 'मैंने एक फिल्म की थी मिर्च मसाला, जिसे केतन मेहता जी ने डायरेक्ट किया था। उसमें हम सारी औरतें थीं, करीब 10 महिलाएं थीं। तब हम मिर्ची की फैक्ट्री में शूट कर रहे थे। वो एक छोटा सा गांव था और वहां बेतहाशा गर्मी थी। वहां पीछे एक शेड जैसा था जहां घास रखे हुए थे। शायद मिर्ची को साफ करने का कोई प्रोसेस वहां होता था। तो बड़े-बड़े बंडल बनाकर रख दिए थे और हम पूरे दिन उसी पर बैठते थे।'

'एक तो हम जवान थे और जुनून भी बहुत था'

पाठक ने कहा, 'सब एक साथ होते थे और कभी-कभी दूसरे कलाकार भी आ जाते थे। तो हमारा उस वक्त वही माहौल था। और हम वक्त हमें कोई फर्क भी नहीं पड़ता था, एक तो हम जवान थे और जुनून भी बहुत था। लेकिन आज मुझे लगता है कि जरूरी नहीं है कि लोगों को इस तरह से रखा जाएगा। आज सुविधाएं मिल सकती हैं। आज कल इतनी सुविधाएं मिलनी लगी हैं कि वो सब देख कर थोड़ा अजीब लगता है। 

'बाजार' और 'राम-लीला' के लिए मिले थे अवॉर्ड

बताते चलें की सुप्रिया पाठक ने अपनी मां दीना पाठक के साथ थिएटर से एक्टिंग की शुरुआत की थी। इसके बाद उन्होंने 'कलयुग' (1981) से फिल्मों में कदम रखा। पाठक को 'बाजार' (1982) और 'राम-लीला' (2013) के लिए अवॉर्ड भी मिले। उन्होंने 'मासूम' और 'मिर्च मसाला' जैसी फिल्मों, 'खिचड़ी' (हंसा के रूप में) और 'साराभाई वर्सेस साराभाई' जैसे टीवी शो में भी जानदार एक्टिंग की। इन सबके अलावा पाठक ने 'सरकार', 'वेक अप सिड', 'रेड 2' और 'खिचड़ी 2' में भी काम किया। एक्टिंग के अलावा सुप्रिया अपने पति पंकज कपूर के साथ एक प्रोडक्शन हाउस चलाती हैं।

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