खेत बचाओ अभियान व जैविक कृषि मेला का आयोजन, बस्तर को सिक्किम की तर्ज पर पूर्ण जैविक बनाने का आह्वान

Updated on 13-06-2026 11:59 AM

जगदलपुर। खेत बचाओ अभियान तथा जैविक कृषि मेला का गरिमामय आयोजन कुम्हरावंड स्थित शहीद गुण्डाधुर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र के सभागार में शुक्रवार को किया गया। इस कार्यक्रम में बस्तर जिले के भारी संख्या में प्रगतिशील किसानों, वैज्ञानिकों और जनप्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित जगदलपुर के विधायक किरण सिंह देव, जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष दिनेश कश्यप और जगदलपुर के महापौर संजय पांडे ने किसानों की उन्नति, भूमि संरक्षण और वैकल्पिक कृषि पद्धतियों को अपनाने पर विशेष बल दिया।

अपने प्रेरणादायी उद्बोधन के दौरान विधायक किरण सिंह देव ने आधुनिकता और जल्दी परिणाम पाने की होड़ में डीएपी और यूरिया जैसे रासायनिक ऊर्वरकों के बढ़ते उपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के खादों से हम अपनी धरती माता को कष्ट दे रहे हैं, जिससे भूमि की ऊर्वरा शक्ति लगातार कम होती जा रही है और यूरिया खेतों को उपजाऊ बनाने के बजाय उन्हें अंदर से जला रहा है। उन्होंने पुराने समय को याद करते हुए साझा किया कि पहले जब हमारे बुजुर्ग केवल गोबर खाद का इस्तेमाल करते थे, तब फसलों और अनाज की खुशबू से पूरा खलिहान और घर महक जाता था। आज इसी रासायनिक असंतुलन के कारण खान-पान और हवा-पानी सब प्रदूषित हो रहा है, जिसका दुष्परिणाम सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है और हार्ट, किडनी, लिवर व फेफड़ों जैसी गंभीर बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

इन समस्याओं से निपटने के लिए उन्होंने बस्तर के किसानों से वापस अपनी जड़ों की ओर लौटने और जैविक व प्राकृतिक खेती को अपनाने की पुरजोर अपील की, जो कि बस्तर की असली पहचान भी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के छोटे से राज्य सिक्किम का उदाहरण देते हुए कहा कि क्षेत्रफल में हमारा बस्तर सिक्किम से भी बड़ा है और जब वह राज्य 100 प्रतिशत जैविक खेती अपनाकर देश का पहला पूर्ण जैविक राज्य बन सकता है, तो बस्तर भी यह मुकाम हासिल कर सकता है। जैविक खेती के आर्थिक और पर्यावरणीय लाभों को समझाते हुए उन्होंने बताया कि गोबर और जैविक खाद के उपयोग से कीटनाशकों और महंगी दवाइयों का खर्च पूरी तरह बच जाता है, जिससे लागत कम और मुनाफा अधिक होता है। इसके साथ ही प्रमाणित तौर पर जैविक पद्धति अपनाने से जमीन की जल सोखने की क्षमता सुधरती है और प्रति एकड़ पैदावार दोगुनी से तिगुनी तक बढ़ सकती है। चूंकि आज हर व्यक्ति को अपना स्वास्थ्य प्यारा है, इसलिए बाजार में रासायनिक अनाज के मुकाबले जैविक उत्पादों की मांग और कीमत दोनों बहुत अधिक मिल रही हैं।

किसानों को आर्थिक संबल देने के उद्देश्य से कार्यक्रम में शासन की कल्याणकारी योजनाओं की भी विस्तार से जानकारी दी गई। विधायक ने बताया कि किसानों को केवल पारंपरिक धान की खेती पर निर्भर न रहकर वैकल्पिक फसलों जैसे कि दाल, तिलहन, कोदो-कुटकी और मक्का के साथ-साथ मौसमी सब्जियों के उत्पादन को भी अपनाना चाहिए, क्योंकि कोदो-कुटकी जैसे मोटे अनाजों की मांग आज समूचे विश्व में देखी जा रही है। केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि कृषक उन्नति योजना के तहत प्रति एकड़ किसानों को 15 हजार रूपए का अनुदान दिया जा रहा है ताकि उनकी जेब पर सीधा बोझ न पड़े। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ सरकार ने प्राकृतिक खेती करने वाले कृषकों के प्रोत्साहन के लिए बजट में 40 करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान रखा है। उन्होंने बस्तर के अनुकूल मौसम का हवाला देते हुए किसानों को नारियल की खेती, सूकर पालन, मुर्गी पालन और मछली पालन जैसे संबद्ध क्षेत्रों से जुड़ने के लिए प्रेरित किया, जिनमें सरकार द्वारा भारी सब्सिडी दी जा रही है।

जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष दिनेश कश्यप ने कृषि और मिट्टी संरक्षण के गंभीर विषय पर गहन चर्चा की। उन्होंने मिट्टी संरक्षण को कृषि की रीढ़ बताते हुए सचेत किया कि रासायनिक खादों के उपयोग से भूमि की उपजाऊ क्षमता समाप्त हो रही है। उन्होंने किसानों से अधिक उपज की होड़ छोड़ टिकाऊ खेती पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया। इसके समाधान के रूप में उन्होंने किसानों को अनिवार्य रूप से वैज्ञानिक तरीके से मृदा परीक्षण (मिट्टी की जांच) कराने और रिपोर्ट के आधार पर ही संतुलित मात्रा में जैविक, हरी व गोबर खाद का उपयोग करने की सलाह दी, जिससे लागत घटेगी और फसलों की गुणवत्ता बेहतर होगी।



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