अब जहाज भी बनाएंगे गौतम अडानी! दुनिया को 30 साल में चाहिए 50,000 से अधिक कमर्शियल शिप
Updated on
09-07-2024 02:03 PM
नई दिल्ली: भारत और एशिया के दूसरे सबसे बड़े रईस गौतम अडानी (Gautam Adani) अब जहाज निर्माण यानी शिपबिल्डिंग में उतरने की योजना बना रहे हैं। गुजरात के मुंद्रा में अडानी ग्रुप (Adani Group) के फ्लैगशिप पोर्ट पर जहाज बनाने का काम शुरू हो सकता है। इसकी वजह यह है कि चीन, जापान और दक्षिण कोरिया में अधिकांश यार्ड कम से कम 2028 तक पूरी तरह बुक हैं। यही वजह है कि दुनिया में जहाज ऑपरेट करने वाली बड़ी कंपनियों को शिपबिल्डिंग के लिए वैकल्पिक जगहों की तलाश है। इनमें भारत भी शामिल है। इस मौके का फायदा उठाने के लिए अडानी ग्रुप शिपबिल्डिंग में उतरने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। अडानी ग्रुप देश का सबसे बड़ा पोर्ट ऑपरेटर है।
मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 में भारत को शीर्ष 10 शिपबिल्डर बनाने और मैरीटाइम अमृत काल विजन में 2047 तक शीर्ष पांच में शामिल होने का लक्ष्य रखा गया है। अडानी ग्रुप का प्लान देश की इस योजना में फिट बैठता है। दुनिया में कमर्शियल शिपबिल्डिंग मार्केट में भारत की हिस्सेदारी महज 0.05% है। दुनिया में कमर्शियल जहाज बनाने वाले देशों की लिस्ट में भारत 20वें स्थान पर है। देश की कुल विदेशी माल-ढुलाई आवश्यकताओं में भारतीय स्वामित्व वाले और भारतीय झंडे वाले जहाजों का हिस्सा लगभग 5% है। अडानी की जहाज निर्माण योजना को मुंद्रा बंदरगाह के लिए 45,000 करोड़ रुपये की विस्तार योजना में शामिल कर लिया गया है। इस योजना को हाल में पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिली है।
62 अरब डॉलर का मार्केट
अडानी ग्रुप ऐसे समय जहाज निर्माण में उतरने की तैयारी कर रहा है जब ग्लोबल शिपिंग इंडस्ट्री डीकार्बनाइजेशन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए धीरे-धीरे ग्रीन शिप की ओर बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार मौजूदा बेड़े को बदलने के लिए अगले 30 वर्षों में 50,000 से अधिक जहाजों का निर्माण किया जाना है। अडानी ग्रुप ने इस बारे में भेजे गए ईमेल का जवाब नहीं दिया। केपीएमजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2047 तक भारत का कमर्शियल शिपबिल्डिंग मार्केट 62 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। साथ ही इससे जुड़े सहायक उद्योग के 37 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इससे 1.2 करोड़ लोगों को नौकरी मिलने की उम्मीद है। केपीएमजी के अनुसार मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 और अमृत काल विजन लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए भारतीय शिपयार्ड्स के सालाना उत्पादन को 2030 तक 0.072 मिलियन ग्रॉस टन से बढ़ाकर 0.33 मिलियन ग्रॉस टन और 2047 तक 11.31 मिलियन ग्रॉस टन तक बढ़ाने की आवश्यकता है। साल 2047 तक घरेलू कार्गो क्षमता में वृद्धि के अलावा भारतीय विदेशी कार्गो की न्यूनतम 5% ढुलाई प्राप्त करने के लिए, अतिरिक्त बेड़े की क्षमता की आवश्यकता है। इसके परिणामस्वरूप घरेलू जहाज निर्माण की मांग अगले 23 वर्षों में 59.74 मिलियन ग्रॉस टन होने का अनुमान है। इनमें पुराने जहाजों का रिप्लेसमेंट भी शामिल है।
क्या है एडवांटेज
जानकारों का कहना है कि किसी नई कंपनी को इस सेक्टर में काफी समय लग सकता है लेकिन अडानी ग्रुप के लिए परिस्थितियां आसान हैं। उसके पास इसके लिए जमनी और और पर्यावरणीय मंजूरी है। हैवी इंजीनियरिंग में अडानी ग्रुप का यह पहला कदम होगा। एसईजेड का दर्जा मिलने से अडानी ग्रुप को अनेक वित्तीय और टैक्स चुनौतियों से निपटने में मदद मिलेगी। इन चुनौतियों के कारण स्थानीय कंपनियां चीन की शिपबिल्डिंग कंपनियों के साथ होड़ करने में असमर्थ है। भारत में आठ सरकारी यार्ड और करीब 20 निजी यार्ड हैं। लार्सन एंड टुब्रो चेन्नई के पास कट्टुपल्ली में एक यार्ड ऑपरेट करती है।
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