
कई गांवों, शहरों, वार्डों और मोहल्लों के नाम सुनने में बड़े अजीब लगते हैं। इसमें से कई तो किसी जाति, समाज या ऐसी चीज को इंगित करते हैं जो सुनने में बेहद आपत्तिजनक लगते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी ऐसे नाम वाले, गांव, शहर, वार्ड, मोहल्ले, गली और सड़कों की जानकारी मांगी है, ताकि नामों को बदला जा सके।
आयोग के निर्देश के बाद राज्य शासन ने भी नगरीय प्रशासन विभाग को चिट्ठी भेजकर ऐसे सभी नामों का ब्योरा मांगा है। दरअसल, छत्तीसगढ़ में गांवों के अधिकांश नाम स्थानीय इतिहास, प्रकृति और सामाजिक संरचनाओं से प्रेरित हैं।
लेकिन इनमें से कुछ नाम जाति-आधारित या अपमानजनक भी होते हैं जो ऐतिहासिक रूप से दलित या निचली जातियों की बस्तियों को इंगित करते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे नाम सामाजिक भेदभाव पैदा करते हैं इसके कारण हाल के कुछ सालों में ऐसे नामों को बदले जाने की मांग भी बढ़ी है।
प्रमुख नाम जो आपत्तिजनक हैं
छत्तीसगढ़ में जाति सूचक या अपमानजनक नाम के संबंध में कई उदाहरण हैं। रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर जिले के कई गांवों में चमार बस्ती नाम का उल्लेख है। चमार- अनुसूचित जाति समुदाय को इंगित करता है। यह नाम छुआछूत और भेदभाव का प्रतीक है।
इसी तरह महासमुंद, जांजगीर चांपा में भंगी बस्ती नाम भी प्रचलित है? यह अनुसूचित जाति, सफाईकर्मी समुदाय से जुड़ा है। बस्तर और कांकेर में चूहरा टोला- चूहरा दलित उप-जाति का संकेत है। यह नाम उत्तर भारत से प्रभावित है और सामाजिक अपमान को दर्शाता है। महार वाड़ा, राजनांदगांव, कोरबा, महार समुदाय की बस्ती। महाराष्ट्र से सटा होने के कारण यह नाम प्रचलित है लेकिन इसे अपमानजनक माना जाता है।
ये हैं नाम