
भोपाल। मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में अप्रैल माह में बाघिन टी-144 और उसके चार शावकों की नौ दिनों के अंतराल में हुई मौत के मामले में उनके कैनाइन डिस्टेंपर वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हुई है। शावकों समेत बाघिन के शवों के पोस्टमार्टम में फेफड़ा संक्रमित पाया गया था। इसके बाद नमूना जांच के लिए भेजा गया था। रिपोर्ट आने के बाद से वन प्रबंधन व सरकार अलर्ट मोड पर है।
टाइगर रिजर्व के दो किलोमीटर की परिधि को क्वारंटाइन जोन बना दिया गया है। जंगल से कोई वन्यजीव बाहर न आए और कोई जीव अंदर न जाए, इसके लिए गश्त कराई जा रही है। जलस्रोतों की तारबंदी कर दी गई है। 40 ट्रैप कैमरों से निगरानी की जा रही है। आसपास के गांवों में कुत्तों का टीकाकरण कराया जा रहा है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव समीता राजौरा ने वेटनरी और अन्य डॉक्टरों की निगरानी टीम गठित कर दी है, जो 15-15 दिन में रिपोर्ट देगी।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बाघिन और उसके शावकों ने जो शिकार किया होगा, उसे वायरस पीड़ित कुत्तों ने और फिर बाघिन और शावकों ने खाया होगा, जिससे उन्हें संक्रमण हुआ। यह वायरस संक्रमण से फैलता है। गुजरात के गिर में 34 शेरों की मौत इस वायरस से 2018 में हुई थी। क्षेत्र के जलाशय जहां से बाघिन व शावक पानी पीते थे, वहां के नमूनों के साथ मांसाहारी वन्यजीवों का विष्ठा एकत्र कर जांच के लिए स्कूल ऑफ वाइल्ड लाइफ फोरेंसिक हेल्थ भेजा जा रहा है।
कान्हा के विभिन्न परिक्षेत्रों में वर्ष 2025-26 में अभी 84 गांवों के 12,734 पशुओं का टीकाकरण किया जा चुका है। इसी प्रकार कान्हा टाइगर रिजर्व द्वारा खापा एवं खटिया परिक्षेत्र में 404 और सरही जोन से जुड़े गावों के 94 कुत्तों का टीकाकरण किया गया है। विभाग की कोशिश है कि इस वायरस को जंगल के अन्य क्षेत्रों में फैलने से रोका जा सके।
कैनाइन डिस्टेंपर एक गंभीर वायरल बीमारी है, जो पालतू और आवारा कुत्तों से वन्यजीवों में तेजी से फैल सकती है। यह संक्रमण केवल सीधे संपर्क से ही नहीं, बल्कि संक्रमित पशुओं के मल-मूत्र के माध्यम से भी फैलता है। जंगलों के आसपास रहने वाले आवारा कुत्ते इस बीमारी के प्रमुख वाहक बन रहे हैं, जिससे वन्यजीवों के लिए खतरा बढ़ गया है। विशेष रूप से टाइगर जैसे बड़े मांसाहारी वन्यजीव इस वायरस से अधिक प्रभावित होते हैं। संक्रमण होने पर इनके तंत्रिका तंत्र पर असर पड़ता है, जिससे उनकी शिकार करने की क्षमता कमजोर हो जाती है और कई मामलों में मृत्यु भी हो जाती है।
- डॉ. अमूल रोकड़े, वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट, वेटरनरी विश्वविद्यालय, जबलपुर।