रिटायर्ड फौजी ने 100 एकड़ में पराली जलने से बचाई

Updated on 09-02-2026 12:07 PM
जांजगीर-चांपा, छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा के जगमहंत निवासी रिटायर्ड एसीपी शैलेन्द्र सिंह बनाफर ने फौज से रिटायर होकर न सिर्फ खेती में नई जान डाली, बल्कि पराली को जलने से रोककर पर्यावरण सुरक्षा का संदेश भी दे रहे हैं।

फौज में रहते हुए भी उनका दिल खेती की ओर खींचता था और रिटायरमेंट के बाद उन्होंने इसे अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। बनाफर ने अपने गांव में 12 एकड़ निजी जमीन के साथ कुल 20 एकड़ जमीन पर खेती शुरू की।

पहले गांव में किसान धान की पराली जलाते थे, जिससे प्रदूषण बढ़ता और मिट्टी की उर्वरता घटती थी। पराली जलाने से कीटाणु मर जाते हैं और मिट्टी में प्राकृतिक खाद घट जाती है। उनके घर के चारों ओर पराली जलती, तो घर में रहना मुश्किल हो जाता था। ऐसे में उन्होंने रीपर मशीन लाई, जो पराली को जलाने की बजाय काटकर मवेशियों का चारा या खेत के लिए खाद बनाने में मदद करती है।

100 एकड़ जमीन पर पराली काे जलने से रोका

इस साल उन्होंने लगभग 100 एकड़ जमीन पर पराली काे जलने से रोका। इसका उपयोग खाद बनाने में या मवेशियों के चारे के तौर पर उपयोग में हो रहा है। उन्हें खुद गांव के गोठान को दो ट्रैक्टर पैरा दान किया है, जो मवेशियों के पेट भरने के काम आ रहा है। इस प्रक्रिया से मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ी, यूरिया की जरूरत कम हुई और खेत स्वच्छ भी रहे।

बनाफर के अनुसार यह तकनीक न सिर्फ पर्यावरण की रक्षा करती है, बल्कि किसानों की लागत भी घटाती है। बनाफर ने गांव के अन्य किसानों को भी इस तकनीक से परिचित कराया। कई किसानों ने अब अपने खेतों में पराली कटवाकर पैरा से खाद तैयार करना शुरू कर दिया है।

उन्होंने घर में चार आवारा घूम रही गायों को रखा और पराली का उपयोग उनके चारे के रूप में किया। इससे आवारा पशुओं की समस्या भी कम हुई और किसानों को प्राकृतिक खाद मिली। उन्होंने मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने गोबर और कम्पोस्ट खाद का उपयोग शुरू किया है।

मिट्टी धीरे-धीरे बंजर हो रही थी

पहले गांव में अधिक यूरिया और डीएपी का उपयोग होता था, जिससे मिट्टी धीरे-धीरे बंजर हो रही थी। बनाफर ने धीरे-धीरे मिट्टी का संतुलन लौटाया और ऑर्गेनिक खेती के प्रयोग शुरू किए। इसके परिणामस्वरूप खेत की उपज बढ़ी और लागत भी कम हुई। उनकी देखा-देखी अब गांव के अन्य किसान भी पराली के उपयोग के लिए प्रेरित हो रहे हैं।

बनाफर ने यह भी बताया कि उन्होंने सब्जियों की ऑर्गेनिक खेती शुरू की, जो उनके घर के लिए पर्याप्त है और यह युवा किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है। उनके अनुसार फौज में देश की सेवा की, अब धरती माता की सेवा करने का समय है।

पर्यावरण और खेती दोनों में संतुलन लाना हमारी जिम्मेदारी है। बनाफर की पहल से गांव में नई चेतना फैली है। पहले युवा खेती छोड़ रहे थे और परंपरागत तरीके अपनाते थे। अब उनकी प्रेरणा से उनके दोस्तों ने 50-60 एकड़ अतिरिक्त खेती शुरू की है।

किसान अब पराली जलाने की बजाय मशीन और मवेशियों का उपयोग कर उसे खेत में खाद के रूप में डाल रहे हैं। इससे जहां पराली जलाने से बच रहे हैं, वही खेत उपजाऊ बन रहे हैं।



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